घटना कोई भी हो। समस्या कुछ भी हो, संगठनों ने परंपरा बना ली है सड़क पर उतरना और बाजार बंद करना।। धरना प्रदर्शन और ज्ञापन
पहले मनमाना चंदा दिया, क्यों कि मांगने वालों में अपने परिचित और प्रतिष्ठित लोग हुआ करते थे। आवश्यकता से अधिक मात्रा मे मिलने के कारण मांगना अधिकार बन गया।। परिणाम ये हुआ कि सार्वजनिक आयोजनो का बजट बेहिसाब बढता चला गया और अनावश्यक बुराइयां पनपने लगी।
एक व्यापारी से मारपीट करने और विरोध में धरना प्रदर्शन, ज्ञापन,प्रेस कॉन्फ्रेंस सब हो रहा है। इससे अच्छा तो यह है कि सभी व्यापारी संघ, संगठन और संस्थाओं को आयोजन समितियों के साथ कलेक्टर की अध्यक्षता में बैठक कर, केवल एक एक मूर्ति और प्रसाद मे सहयोग का न्यूनतम तय कर समझ बना लेते
न डी जे बजेगा,न धुमाल बजेंगे और न हर 100 मीटर पर सार्वजनिक आयोजनों से नागरिक परेशान होंगे। धरना प्रदर्शन ज्ञापन और विरोध प्रदर्शन ये सब अनावश्यक है।,
